रविवार, मई 26, 2024
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Parenting:माता-पिता के कर्तव्य एवं दायित्व

Parenting– माता-पिता के कर्तव्य एवं दायित्व:

समस्त प्राणी जगत में मनुष्य जीवन सर्वश्रेष्ठ माना जाता है. मनुष्य के अन्दर विद्यमान कर्तव्य और उत्तरदायित्व भावना ही उसे अन्य प्राणियों से अलग उत्कृष्टता का गौरव प्रदान करती है. मनुष्य जीवन के प्रमुख कर्तव्यों में से संतानोत्पत्ति एवं उसका पालन करना एक महत्वपूर्ण कर्तव्य है तथा माना जाता है कि संतान को जन्म देने के बाद व्यक्ति पितृ-ऋण से भी मुक्त हो जाता है. संतान प्राप्ति की इच्छा सभी के अन्दर होती है परन्तु संतान होना मात्र सौभाग्य की बात नहीं है, अपितु उसका सभ्य, स्वस्थ, बुद्धिमान, योग्य और जिम्मेदार नागरिक होना अधिक महत्वपूर्ण बात है. संतान के जन्म और पालन-पोषण प्रक्रिया में ही उसके व्यक्तित्व का उत्थान या पतन अवलंबित होता है. मैंने अनेक स्थानों पर यह अनुभव किया है कि अधिकतर लोग अपनी आजीविका, खेती, खाने-पीने, मनोरंजन, नए-नए वस्त्र आदि को ही अपना सब कुछ मानते हैं परन्तु अपने नौनिहालों की अभ्युन्नति का बिलकुल भी ध्यान नहीं रखते हैं, जबकि संतान का लालन-पालन अधिक महत्वपूर्ण है. बच्चों के उचित पालन-पोषण और अच्छे संस्कारों से ही अच्छे नागरिकों का निर्माण तथा भावी समाज की सूचिता, सुव्यवस्था और उन्नति निश्चित की जा सकती है. संतानों के योग्य अथवा अयोग्य होने पर ही घर, परिवार, समाज और देश की उन्नति अथवा अवनति निर्धारित होती है. माता-पिता को संतान को जन्म देने से पूर्व बच्चे के लालन-पालन की समुचित विधि, चरित्र-निर्माण करने का तरीका, अच्छे संस्कार देने की विधि का ज्ञान होना चाहिए.


   श्रेष्ठ बच्चों के निर्माण के लिए माता-पिता के सही अर्थ को समझना होगा. माता-पिता के आचार-विचार, रहन-सहन से ही बच्चे की पृष्ठभूमि निर्मित होती है. भगवान राम, कृष्ण, ध्रुव, प्रह्लाद आदि महापुरुषों का जन्म उनके माता-पिता अथवा पूर्वजों की लम्बी तपश्चर्या का परिणाम था. महाभारत के युद्ध में अर्जुन के अतिरिक्त चक्रव्यूह भेदन की विधि जानने वाले एकमात्र अभिमन्यु ही थे, जिसे उन्होंने अपनी माँ के गर्भ में ही सीख लिया था. आजकल भी हम देख सकते हैं कि एक संगीतज्ञ की संतान में संगीत के गुण, राजनीतिज्ञ की संतान में राजनैतिक गुण, अभिनेता की संतान में अभिनय के गुण स्वाभाविक रूप से होते हैं. बच्चे माता-पिता के शारीरिक व मानसिक संस्कारों के सांचे में ढले हुए व्यक्तित्व के होते हैं. माता-पिता को बच्चे की अभिलाषा से पूर्व स्वयं को मानसिक और शारीरिक रूप से तैयार करना चाहिए. हमारे तत्ववेत्ता ऋषियों द्वारा षोडश संस्कारों का विधान किया गया था, जिसमें गर्भाधान, पुंसवन, सीमन्तोन्नयन संस्कार बच्चे के गर्भ में आने से पूर्व व गर्भ में रहते पवित्रता के साथ किये जाते थे, ताकि बच्चा माता-पिता की भावना के अनुरूप जन्म ले सके. इस प्रकार संतान को संस्कारवान बनाने की प्रक्रिया गर्भ में आने से बहुत समय पूर्व ही प्रारंभ हो जाती है.

माता-पिता को संतान के गर्भ में आते ही रहन-सहन, खान-पान आदि में सात्विकता का समावेश कर लेना चाहिए. माता-पिता में प्रेम और सद्भाव होना चाहिए अन्यथा बच्चे असभ्य व दुर्गुणी स्वभाव के होते हैं. माता-पिता की मनोदशा का सूक्ष्म प्रभाव बच्चों की बुद्धि पर पड़ता है. जन्म से चार-पांच वर्ष की अवस्था तक बच्चा माता, पिता, परिवार की प्रत्येक क्रियाकलापों का बड़ी सूक्ष्मता से अवलोकन करता है. इस अवस्था में बच्चे को भय, क्रोध, कलह, अपवित्रता, अश्लीलता आदि से दूर रखना चाहिए क्योकि इन सबका उसके के कोमल मस्तिष्क पर बहुत बूरा असर पड़ता है, जिससे बच्चे स्वभावतया उद्दण्ड, अशिष्ट बन जाते हैं. लगभग पांच-छ वर्ष में बच्चे के अन्दर जिज्ञासा की प्रवृत्ति का विकास होने लगता है. अब वह खेल की सामग्री और परिवेश की वस्तुओं को महज खेल का साधन नहीं मानता है अपितु उनके बारे में पूर्ण जानकारी भी प्राप्त करना चाहता है. इस समय बच्चों के सम्मुख महापुरुषों के आदर्श, राष्ट्र-प्रेम के उदहारण, मधुर संगीत, अच्छी कहानियां, सुन्दर कविताएँ आदि प्रस्तुत करने चाहिए, इससे बच्चों का मनोरंजन तो होगा ही साथ में उनके मस्तिष्क में अच्छे संस्कारों की स्थापना भी हो सकेगी. हम इस अवस्था में ही बच्चों का सही-सही मार्गदर्शन करके अपने घर, समाज और देश का उन्नत भविष्य निश्चित कर सकते हैं. बच्चों का विकास समाज अथवा देश का महत्वपूर्ण अंग समझकर किया जाना चाहिए. समाज में बुराइयों का जन्म ही तब होता है जब उसके सदस्यों में समाज भावना का अभाव और स्वार्थ भावना का प्राबल्य होता है. अपने समाज को अच्छा व आदर्श बनाने के लिए आगे आने वाली पीढ़ी का नव-निर्माण करना बहुत आवश्यक है. 

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